उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभाग ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग यानी यूकेपीएससी से चयनित अधिशासी अधिकारियों (ईओ) को नगर पालिका और नगर पंचायतों में नियुक्त करने के बजाय नगर निगमों में प्रभारी सहायक नगर आयुक्त की जिम्मेदारी सौंप दी है। वहीं उनके स्थान पर कई निकायों में क्लर्क, सफाई निरीक्षक और कर कर्मचारियों को प्रभारी ईओ बना दिया गया है। इस व्यवस्था को लेकर विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।
दरअसल, पहले विभाग के पास नियमित ईओ की कमी थी, जिसके चलते अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ बनाया गया था। लेकिन वर्ष 2024 में उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से चयनित 51 नए अधिशासी अधिकारी विभाग को मिल गए। इसके बावजूद विभाग ने इन अधिकारियों को नियमानुसार नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में तैनात करने के बजाय नगर निगमों में प्रभारी सहायक नगर आयुक्त के पद पर भेज दिया।
जानकारी के अनुसार, शालिनी नेगी को काशीपुर, दीपा परिहार को पिथौरागढ़, सुनील वर्मा को श्रीनगर, अमन कुमार को ऋषिकेश, अंजली रावत को हरिद्वार, शालिनी को हल्द्वानी, रणदीप को रुद्रपुर, गजेंद्र पाल को हल्द्वानी और शिवानी को रुड़की नगर निगम में प्रभारी सहायक नगर आयुक्त बनाया गया है। इनके मूल पद खाली होने के बाद कई निकायों में क्लर्क, सफाई निरीक्षक और कर कर्मचारियों को प्रभारी ईओ की जिम्मेदारी दी गई है।
इस व्यवस्था पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। वर्ष 2021 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में भी विभाग की इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि बिना स्पष्ट नीति और वरिष्ठता का पालन किए अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को अधिशासी अधिकारी का प्रभार दिया गया, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।
अब जबकि विभाग के पास पर्याप्त संख्या में नियमित ईओ उपलब्ध हैं, तब भी पुरानी व्यवस्था जारी रहने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इस पूरे मामले में विभाग की कार्यप्रणाली और नियुक्ति प्रक्रिया पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि इस संबंध में शहरी विकास निदेशक एवं अपर सचिव विनोद गिरी गोस्वामी का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि विभाग इस व्यवस्था में बदलाव करता है या नहीं।

