उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग में प्रभारी अधिशासी अधिकारियों (ईओ) की नियुक्ति को लेकर बड़ा प्रशासनिक यू-टर्न देखने को मिला है। शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा ने महज तीन दिन के भीतर अपने ही विभाग के फैसले को पलटते हुए प्रभारी ईओ की सभी नियुक्तियों के आदेश तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिए हैं। इस फैसले के बाद विभाग में हलचल तेज हो गई है और पूरे मामले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।
दरअसल, 17 जुलाई को शहरी विकास विभाग ने नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में बड़े पैमाने पर प्रभारी ईओ की तैनाती के आदेश जारी किए थे। इन आदेशों के तहत कई स्थानों पर क्लर्क, सफाई निरीक्षक, अकाउंट कर्मचारी और कर अधीक्षकों जैसे अन्य संवर्ग के कर्मचारियों को प्रभारी अधिशासी अधिकारी का दायित्व सौंप दिया गया था। वहीं, उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से चयनित ईओ अधिकारियों को नगर निगमों में प्रभारी सहायक नगर आयुक्त (एसएनए) के रूप में तैनात किया गया था।
इन नियुक्तियों को लेकर लगातार सवाल उठने लगे। मीडिया में खबरें सामने आने के बाद नियुक्तियों के आधार और प्रक्रिया पर बहस तेज हो गई। शुरुआत में मंत्री राम सिंह कैड़ा ने इसे विभाग की पूर्व व्यवस्था बताते हुए सही ठहराया और कहा कि ईओ के कई पद खाली होने के कारण यह व्यवस्था की गई है।
हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद मंत्री ने अपना रुख बदलते हुए सचिव शहरी विकास नितेश झा को सभी आदेश तत्काल निरस्त करने के निर्देश दिए। इसके बाद अपर सचिव एवं निदेशक शहरी विकास विनोद गिरी गोस्वामी ने प्रभारी ईओ की सभी तैनातियों को रद्द करने के आदेश जारी कर दिए।
उधर, उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने मंत्री के इस फैसले का स्वागत किया है। संघ का कहना है कि रिक्त अधिशासी अधिकारी पदों पर जल्द से जल्द नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए और इसके लिए अधियाचन तत्काल उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को भेजा जाए, ताकि योग्य युवाओं को रोजगार का अवसर मिल सके।
अब सवाल यह है कि आखिर ऐसी नियुक्तियां किस आधार पर की गई थीं और तीन दिन के भीतर उन्हें वापस लेने की नौबत क्यों आ गई। फिलहाल सरकार ने आदेश तो रद्द कर दिए हैं, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने शहरी विकास विभाग की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

