उत्तराखंड के चमोली जिले में मां नंदा की बड़ी जात को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। पांच सितंबर से शुरू होने वाली इस ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा में इस बार सुंग गांव का चौसिंग्या खाडू आस्था का प्रमुख केंद्र रहेगा। आठ माह का यह चार सींगों वाला मेढ़ा मां नंदा की कैलाश यात्रा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा।
मान्यता के अनुसार चौसिंग्या खाडू को मां नंदा का शुभदूत और संदेशवाहक माना जाता है। खास बात यह है कि सुंग गांव के रमेश सिंह बिष्ट ने इस खाडू के जन्म लेते ही इसे मां नंदा की जात के लिए समर्पित कर दिया था। पिछले तीन महीनों तक यह खाडू चीन सीमा क्षेत्र के लपथल बुग्याल में चरान के लिए गया था। अब 28 अगस्त को इसे वापस सुंग गांव लाया गया है।
ग्राम प्रधान तीरथ सिंह बिष्ट के मुताबिक, तीन सितंबर को चौसिंग्या खाडू को कुरुड़ मंदिर पहुंचाया जाएगा। इसके बाद पांच सितंबर को मां नंदा की कैलाश विदाई के दौरान यह सबसे आगे चलते हुए यात्रा का मार्गदर्शन करेगा। इससे पहले वर्ष 2014 में भी सुंग गांव का चौसिंग्या खाडू मां नंदा की जात में शामिल हुआ था।
मां नंदा की बड़ी जात का आयोजन 12 साल बाद होता है और इसे उत्तराखंड की महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। करीब 280 किलोमीटर लंबी इस कठिन पदयात्रा में मां नंदा की डोली, छंतोलियां और बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग-अलग पड़ावों से होकर आगे बढ़ते हैं। श्रद्धालु चौसिंग्या खाडू की पीठ पर कपड़े में श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, स्थानीय पकवान और आभूषण बांधते हैं।
पांच सितंबर को कुरुड़ मंदिर से यात्रा शुरू होकर विभिन्न पड़ावों से गुजरेगी। 12 सितंबर को रामणी गांव में विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा। इसके बाद यात्रा लाटा, कनोल और अन्य पड़ावों से होते हुए 15 सितंबर को वाण पहुंचेगी। यहां से यात्रा रणकधार और गैरोली पातल होते हुए 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां मां नंदा की सप्तमी पूजा आयोजित होगी।
19 सितंबर को श्रद्धालु बगुवावासा, पातर नचौणियां, कैलवा विनायक और रूपकुंड होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेंगे। 20 सितंबर को होमकुंड में मां नंदा की पूजा के बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा। इसी के साथ इस धार्मिक यात्रा की सबसे भावुक और महत्वपूर्ण परंपरा पूरी होगी।

