टीईटी
उत्तराखंड के करीब 15 हजार शिक्षकों के लिए राहत की खबर सामने आई है। लंबे समय से टीईटी की अनिवार्यता को लेकर असमंजस और चिंता झेल रहे शिक्षकों के लिए सरकार अब अलग से शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी कराने की तैयारी कर रही है। खास बात यह है कि इसके लिए उत्तर प्रदेश के मॉडल का अध्ययन किया जा रहा है।
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को इस संबंध में प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। शिक्षक प्रतिनिधिमंडल ने अपनी समस्याओं को लेकर शिक्षा मंत्री के सामने मामला रखा था। शिक्षकों का कहना है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति वर्ष 2010 से पहले हुई थी, उस समय लागू सेवा शर्तों को पूरा करने के बाद ही उनकी नियुक्तियां की गई थीं। अब उन्हें टीईटी की अनिवार्यता के दायरे में लाया जा रहा है।
शिक्षकों का कहना है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है जिनकी उम्र अब 53 से 54 वर्ष तक हो चुकी है। ऐसे में इस उम्र में दोबारा टीईटी परीक्षा की बाध्यता उनके लिए बड़ी चुनौती बन गई है। उनका तर्क है कि अगर वे टीईटी पास नहीं कर पाते हैं तो इसका असर उनकी पदोन्नति के साथ-साथ नौकरी पर भी पड़ सकता है।
इसी समस्या को देखते हुए शिक्षकों ने या तो टीईटी से छूट देने या फिर कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से विशेष टीईटी कराने की मांग की है। बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बड़ी संख्या में कार्यरत शिक्षकों के लिए विशेष अध्यापक पात्रता परीक्षा कराने की तैयारी की जा रही है। उत्तराखंड सरकार अब इसी मॉडल का अध्ययन कर रही है।
उत्तराखंड बोर्ड के सचिव विनोद ढौंढियाल और प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कुंवर सिंह रावत को इस संबंध में प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि अभी अलग टीईटी कराने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। प्रस्ताव तैयार होने और शासन से आदेश जारी होने के बाद ही परीक्षा की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। शिक्षा मंत्री ने कहा है कि 17 और 18 अगस्त को इस मुद्दे पर शिक्षकों और अधिकारियों के साथ बैठक होगी। सरकार शिक्षक हित में जो संभव होगा वह कदम उठाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार का प्रस्ताव कितनी जल्दी तैयार होता है और क्या करीब 15 हजार शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत मिल पाएगी। फिलहाल शिक्षकों की नजर 17 और 18 अगस्त को होने वाली अहम बैठक पर टिकी है।

