उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध मां वाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के अवसर पर ऐतिहासिक बग्वाल का भव्य आयोजन हुआ। खोलीखाड़ दुबाचौड़ मैदान में चार खाम और सात थोक के बग्वालियों ने सदियों पुरानी इस परंपरा को निभाया। खास बात यह रही कि इस बार भी बग्वाल में पत्थरों की जगह फल और फूलों का प्रयोग किया गया।
दोपहर 1 बजकर 48 मिनट पर प्रधान पुजारी की पूजा-अर्चना और मां वाराही के जयकारों के साथ बग्वाल शुरू हुई। चार खामों वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया के बग्वाली पारंपरिक रंग-बिरंगे परिधानों और पगड़ियों में मैदान में उतरे। हाथों में बांस और रिंगाल से बनी ढालें थीं और वातावरण शंखनाद से गूंज उठा।
करीब आठ मिनट तक चले इस अनूठे आयोजन में मैदान में फलों और फूलों की जमकर बरसात हुई। 1 बजकर 55 मिनट पर बग्वाल समाप्त हुई। धार्मिक मान्यता के अनुसार फल और फूलों से खेली जाने वाली बग्वाल को शुभ और फलदायी माना जाता है।
बग्वाल की परंपरा को लेकर स्थानीय लोककथाओं में नरबलि से जुड़ी मान्यताओं का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि नरबलि के विकल्प के तौर पर चारों खामों के लोगों के बीच प्रतीकात्मक युद्ध की परंपरा शुरू हुई। पुराने समय में इस रस्म में पत्थरों का इस्तेमाल होता था और कई बार लोग गंभीर रूप से घायल भी होते थे।
वर्ष 2013 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बग्वाल में बदलाव किया गया और पत्थरों के स्थान पर फल और फूलों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया। इसके बावजूद इस ऐतिहासिक परंपरा का मूल स्वरूप और धार्मिक महत्व आज भी कायम है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी देवीधुरा पहुंचे। उन्होंने मां वाराही के दर्शन कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। उन्होंने बग्वाल को उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की अनूठी मिसाल बताया।
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की बात कही। साथ ही 9.80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टी लेवल पार्किंग बनाए जाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित करने के साथ इसकी 
