पलायन
उत्तराखंड में पलायन के कारण खाली हो चुके गांवों, जिन्हें आमतौर पर ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता है, की वास्तविक संख्या का खुलासा अब आगामी जनगणना से होगा। प्रदेश में 25 अप्रैल से शुरू होने वाली जनगणना के तहत हर गांव तक पहुंचकर विस्तृत गणना की जाएगी। इससे यह साफ हो सकेगा कि पिछले वर्षों में पलायन के कारण कितने गांव पूरी तरह से खाली हो चुके हैं और कितने गांवों में रिवर्स पलायन हुआ है।
जनगणना निदेशालय के अनुसार पहले चरण में 25 अप्रैल से 24 मई तक भवन गणना और मकान सूचीकरण का कार्य किया जाएगा। इसके बाद अगले वर्ष 9 से 28 फरवरी के बीच जनगणना का मुख्य चरण आयोजित होगा। इस पूरी प्रक्रिया के माध्यम से राज्य के सभी गांवों की स्थिति का विस्तृत आंकलन किया जाएगा।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में कुल 16,793 गांव थे। इनमें से 1048 गांव ऐसे पाए गए थे, जो पलायन के कारण पूरी तरह से खाली हो चुके थे। प्रदेश में पलायन लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक मुद्दा रहा है। इसी समस्या को देखते हुए राज्य सरकार ने पलायन आयोग का गठन भी किया था, जो लगातार रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने और गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।
जनगणना निदेशालय के निदेशक इवा आशीष श्रीवास्तव के अनुसार इस बार जनगणना टीम राज्य के प्रत्येक गांव तक पहुंचेगी। उनका कहना है कि 16 साल बाद होने वाली इस जनगणना से यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्य में घोस्ट विलेज की संख्या कितनी बढ़ी है या फिर रिवर्स पलायन के कारण कुछ गांवों में फिर से आबादी लौट रही है।
2011 के आंकड़ों के अनुसार पौड़ी जिले में सबसे अधिक 331 घोस्ट विलेज थे। इसके अलावा पिथौरागढ़ में 103, अल्मोड़ा में 105, चमोली में 76 और बागेश्वर में 73 गांव खाली पाए गए थे। वहीं उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और देहरादून जैसे जिलों में भी कई गांवों में आबादी नहीं बची थी।
जनगणना की तैयारियों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए जा रहे हैं। नौ मार्च से देहरादून में मास्टर ट्रेनरों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन प्रशिक्षकों को मकान सूचीकरण, डेटा एंट्री और मोबाइल एप के माध्यम से जनगणना की प्रक्रिया से जुड़ी सभी बारीकियों की जानकारी दी जाएगी।

इसके बाद यही मास्टर ट्रेनर प्रदेशभर में कर्मचारियों और अधिकारियों को जनगणना से संबंधित प्रशिक्षण देंगे, ताकि पूरी प्रक्रिया को सटीक और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जा सके। जनगणना के बाद उत्तराखंड में पलायन और घोस्ट विलेज की वास्तविक स्थिति साफ तौर पर सामने आने की उम्मीद है।
