
हरिद्वार के हर की पैड़ी पर रविवार को 115वां मुल्तान जोत महोत्सव उत्साह और भक्ति के रंगों से सराबोर रहा। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं ने गंगा किनारे अनूठे अंदाज़ में आस्था का उत्सव मनाया। खास बात यह रही कि हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं ने दूध और गंगाजल से एक-दूसरे पर पिचकारियां चलाकर दूध की होली खेली।
हर हर गंगे के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। हरियाणा, पंजाब, दिल्ली सहित कई राज्यों से आए भक्तों ने इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत बनाया। आयोजन स्थल पर सांस्कृतिक विविधता और एकता की अद्भुत छवि नजर आई, जिसे देख ऐसा लगा जैसे हरिद्वार में ‘लघु भारत’ बस गया हो।
महोत्सव की शुरुआत सुबह भजन-कीर्तन से हुई, जिसके बाद श्रद्धालुओं ने दूध और गंगाजल से अभिषेक किया। इसके साथ ही पूरे परिसर में भक्तिमय माहौल व्याप्त हो गया। आयोजन के दौरान सुरक्षा और सफाई व्यवस्था के भी पुख्ता इंतज़ाम किए गए थे।
इतिहास से जुड़ी परंपरा
अखिल भारतीय मुल्तान संगठन के अध्यक्ष महेंद्र नागपाल ने बताया कि यह परंपरा वर्ष 1911 में शुरू हुई थी, जब पाकिस्तान के मुल्तान शहर से रूपचंद नामक एक भक्त भाईचारे और शांति की कामना लेकर पैदल हर की पैड़ी पहुंचे और मां गंगा में जोत अर्पित की। तभी से यह परंपरा निरंतर जारी है, जो अब जनसमूह की सामूहिक आस्था का प्रतीक बन गई है।
रविवार शाम को इस महोत्सव का समापन शोभायात्रा के साथ होगा, जिसमें मां गंगा को विधिपूर्वक जोत अर्पित की जाएगी। आयोजन ने न सिर्फ धार्मिक समरसता को बढ़ावा दिया, बल्कि श्रद्धालुओं को सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ने का कार्य किया।
मुल्तान जोत महोत्सव अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब और अखंड भारत की भावना का जीवंत प्रतीक बन चुका है।