देहरादून/नई दिल्ली। हिमालयी पारिस्थितिकी पर मंडराते खतरे को लेकर संसद में गंभीर चिंता जताई गई। हरिद्वार से सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने लोकसभा के शून्यकाल में हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।
उन्होंने कहा कि हिमालय, जिसे “एशिया का जल स्रोत” माना जाता है, आज जलवायु परिवर्तन के कारण अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दशकों में हिमालय के ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 15 से 20 प्रतिशत तक घट चुका है और कई छोटे ग्लेशियर समाप्ति की कगार पर हैं। उत्तराखंड में यह स्थिति और अधिक चिंताजनक बताई गई।
सांसद रावत ने सरकार से मांग की कि ग्लेशियल झीलों की रियल टाइम सैटेलाइट और ग्राउंड मॉनिटरिंग को मजबूत किया जाए। साथ ही उच्च जोखिम वाली झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम को प्राथमिकता से लागू करने पर जोर दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने पर दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और डेटा संग्रहण की व्यवस्था को और सशक्त बनाया जाना जरूरी है, ताकि भविष्य में संभावित आपदाओं का बेहतर प्रबंधन किया जा सके।
इसके अलावा उन्होंने हिमालयी राज्यों के लिए एक व्यापक जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन नीति बनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
अंत में सांसद रावत ने विश्वास जताया कि केंद्र सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्द ठोस कदम उठाएगी और हिमालय की सुरक्षा के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करेगी।

