हरिद्वार में कुंभ मेले के लिए आरक्षित भूमि पर बढ़ते कब्जों को लेकर चिंता जताई जा रही है। संत समाज और स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन जमीनों पर कभी साधना और आध्यात्मिक गतिविधियां होती थीं, वहां अब स्थायी निर्माण और बड़े भवन बनते जा रहे हैं।
जानकारों के अनुसार, पहले कुंभ मेले के दौरान संत सीमित संसाधनों में रहते थे और अस्थायी ढांचे बनाकर तप, साधना और प्रवचन करते थे। समय के साथ इन क्षेत्रों में स्थायी निर्माण बढ़ा है, जिससे मूल स्वरूप प्रभावित हो रहा है।
बताया गया कि पहले विभिन्न अखाड़ों और संतों को अस्थायी रूप से भूमि आवंटित की जाती थी, लेकिन अब उन्हीं स्थानों पर स्थायी ढांचे खड़े हो गए हैं। कुछ मामलों में भूमि के दुरुपयोग और अवैध कब्जों के आरोप भी सामने आए हैं।
विशेष रूप से सप्तऋषि क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में, जहां पहले नदी किनारे खुले स्थान हुआ करते थे, अब निर्माण कार्य बढ़ गया है। इससे पर्यावरण और धार्मिक महत्व दोनों पर असर पड़ने की बात कही जा रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस स्थिति के लिए प्रशासनिक अनदेखी और निगरानी की कमी जिम्मेदार है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में कुंभ मेले के आयोजन और धर्मनगरी की पहचान पर संकट खड़ा हो सकता है।
संत समाज और नागरिकों ने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि कुंभ क्षेत्र की भूमि को संरक्षित किया जाए और अवैध निर्माण पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि हरिद्वार की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सके।
